Note:- यदि आप सहज योग meditation में नये है तो पहले नीचे दिये...... कैसे प्राप्त करें आत्म साक्षात्कार? कुण्डलिनी जागरण और सहजयोग ध्यान विधि से.... उसे vedio को देखें और नजदी की सहज योग केद्र में जरूर आए। और अधिक जानकारी के लिए नीचे दिये message box से हमसे पूछ सकतें है |
यह vedio केवल पूराने ( old )साधको के लिए है
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जो लोग बेईमान हैं जो लोग अत्यन्त चालाक है । चालाकी आप लोगों को दाई ओर के पतन की खाई तक ले जा सकती है ।
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यह स्थिति अत्यन्त दण्डनीय है क्योकि इसके कारण लोगो मे भिन्न प्रकार के शारीरिक रोग हो जाते है ।उनके हाथों और पैरों मे लकवा भी मार सकता है ।उन्हे जिगर के रोग भी हो सकते है ।ऐसी समस्यायें उत्पन्न होने की स्थिति मे जब लोग दाई ओर के विकारो के कारण कष्ट उठाते है तब उन्हे श्री गणेश की पूजा करनी चाहिये ।श्री गणेश जी को स्मरण करने के सुगम तरीका है कि उनके (श्रीमाताजी) के फोटोग्राफ के सम्मुख बैठकर उनसे चैतन्य लहरियाॅ प्राप्त करें स्यंम को संतुलित करने की यह सर्वोत्तम विधि है ।
परम पूज्य श्रीमाताजी
कबैला 25/9/1999
........ जब चक्रों में दोष हो जाता है तभी आप बीमार पड़ जाते हैं। अब अगर आप बाहर से किसी पेड़ को, उसके फूलों को उसके पतों को दवा दें तो थोड़ी देर के लिये तो वे ठीक हो जायेंगे फिर सत्यानाश हो जाएगा, पर अगर उनकी जड़ में जो चक्र हैं उन चक्रों को अगर आप ठीक कर दें तो बीमार पड़ने की कोई बात ही नहीं।
प॰ पू॰ श्रीमाताजी
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......... ध्यान देने से आपको पता लगेगा की आपके अंदर कौन से चक्र की पकड़ है, उसे आपको साफ करना है। इसको प्रत्याहार कहते हैं, माने इसकी सफाई होनी चाहिये।
प॰ पू॰ श्रीमाताजी
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......... मध्य के पांचों चक्र मूलतः भौतिक तत्वों के बने हैं तथा पांचों तत्वों से इन चक्रों का शरीर बना है। हमें पूर्ण सावधानी से इन पांचों चक्रों का संचालन करना चाहिये। जिन तत्वों से ये चक्र बने हैं उन्हीं में इनकी अशुद्धियों को निकाल कर इन चक्रों का शुद्धीकरण करना है।
प॰ पू॰ श्रीमाताजी, 18.1.1983
........चक्र कुप्रभावित होने पर सम्बन्धित देवता वहाँ से स्थान त्याग कर देते हैं, अतः उस चक्र का मंत्र उच्चारण करके परम्पूज्य श्रीमाताजी के नाम की शक्ति से उस देवता का आवाहन किया जाता है। उपचार के लिये विपरीत पाश्वॅ का हाथ प्रभावित चक्र पर रखें और प्रभावित पाश्वॅ का हाथ फोटो की ओर फैलायेँ।
प॰ पू॰ श्रीमाताजी, निर्मला योग, जुलाई-अगस्त, 1983
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........ ऐसा नहीं है कि सहजयोग में आने के बाद आपको कोई बीमारी ही नहीं होती है, कारण यह है कि सहजयोग में आने के बाद जो ध्यान-धारणा और प्रगति आपने करनी होती है, वो आप नहीं करते। फिर भी आपके कष्ट घट जाते हैं।
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....... सहजयोग में आने के बाद एक महीने में ही आप पूरी तरह से सहजयोग को समझ सकते हैं और उसमें उतर भी सकते हैं, पर जिस प्रकार रोज हम लोग स्नान करके अपने शरीर को साफ करते हैं, उसी प्रकार रोज अपने चक्रों को भी आपको साफ करना पड़ेगा।
प॰ पू॰ श्रीमाताजी, दिल्ली, 2.3.1991
आखिर यह नाम दान / गुरू मन्त्र है क्या ?
क्यों दिया जाता है ? क्यों लेना चाहिए ?
कबतक प्रभावी है ?
*सबसे बड़ा सवाल* गुरू मन्त्र किस से लें
हम मे से बोहोत सारे लोग आज यह जानते हैं कि हमारे शरीर में 7 चक्र और 3 नाड़िया होती है .... कुछ एक कुण्डलिनि शक्ति के बारे मे भी जानते हैं ..... जो नहि जानते उनके लिए बता देते हैं
मानव शरीर में परमात्मा द्वारा स्थापित एक सुक्ष्म शरीर भी होता है जिसमे प्रमुख 3 नाड़ियां ईड़ा पिंगला व सुषुम्ना हैं
ईड़ा बायीं तरफ पिंगला दायीं तरफ व सुषुम्ना मध्य में स्थापित की गई (रीढ़ की हड्डी के बीच मे) अब ईस नाड़ी पर 7 चक्र स्थापित हैं क्रमश:
1. मूलाधार चक्र रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से मे
2. स्वाधिष्ठान चक्र कमर में
3. मणिपूर चक्र नाभी में
4. अनहत चक्र हृदय में
5. विशुद्धि चक्र कण्ठ में
6. अगन्य चक्र माथे में
7. सहस्त्रार चक्र सर के तालू भाग में
जैसा कि आपने जाना कि कौन कौन से चक्र व नाड़ियां हमारे शरीर में स्थापित हैं
*अब सवाल यह है कि यह काम क्या करते हैं*
छोटा सा उत्तर दूंगा कि अपनी जद मे आने वाले अंगों को सुचारू रूप से न केवल चलाते है बल्कि नुक्सान की भरपाई तक करते हैं और भी आध्यात्मिक गुण हैं वह कभी बाद में चर्चा करेंगे आज हम नामदान की बात करते हैं
तो आपने नाड़ी , चक्र जान लिए
कुण्डलिनि क्या है ?
कुण्डलिनि परमात्मा की वह शक्ति हेै जो गर्भ मे पल रहे 2 से 3 महीने के भ्रूण में तालू भाग से प्रवेश कर नाड़ियों व चक्रों की स्थापना कर के हृदय में श्री शिव स्वरूप आत्मा को स्थापित कर रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे त्रिकोणाकार अस्थि पर जाकर 3.5 कुण्डल मार कर बैठ जाती है या सो जाती है ईसके पास हमारे सभि जन्मों का लेखा जोखा सुरक्षित रहता है और उसी के मुताबिक हमे आगे के जन्म मिलते हैं
तो यह सोई हुई शक्ति एक वरदान है परमात्मा का यदि यह जाग जाए तो परमीत्मा से जीते जी सम्पर्क जोड़ देती है व न केवल कर्मों से मुक्ति मिल सकती है बल्कि असाध्य रोग समस्याएं ठीक होने लगती हैं
और भी बोहत फायदे होते हैं
यग खुद भी यहि चाहती है कि ईसे जगाया जाए और जिस तालू भाग से यह शरीर में प्रवेश हुई थी उसी दशम द्वार को भेद कर यह परमात्मा से एकाकार हो जाए
ईस क्रिया में कई सारे फायदे भी होते है व कई सारी समस्याएं भी आती है
जैसे कि चक्र की खराबी
हमारे जो चक्र हैें वह देवी देवताओं द्वारा संचालित हैं चक्र मे खराबी या किसी कारणवश जब देवता चक्र से चले जाते हैं तो चक्र बन्द हो जाता है जिसके कारण कुण्डलिनि उस चक्र से निचले स्तर पर रूक जाती है
*नाम दान* एक एसा व्यक्ति जो स्वयं आत्मसाक्षातकारी हो वह आपके चक्रों को देख कर/ महसूस कर के आपको उस चक्र से सम्बन्धित दोवता को प्रसन्न करने वाले शब्द / क्रिया या मन्त्र बता देता है
जिसे आम भाषा में गुरू जी से नाम दान या गुरू मन्त्र लेना कहा जाता है
ईस सब में वह मन्त्र देने वाला व्यक्ति एक सन्देशवाहक की भूमिका निभाता है कि आपको आपके चक्र के देवता का सानिध्य प्राप्त हो व आपकी कुण्डलिनि आप को भवसागर पार करा कर परमात्मा से जोड़ दे
(भवसागर भी हमारे शरीर के अन्दर ही होता है )
तो अब सवाल यह है कि नाम दान कब तक रहे अगर देवता आ गए और आप फिर भी मन्त्र पढ़ते रहे तो फिर तो वे नाराज हो कर चले जाएंगे कि यह तो बस बुलाने मे लगा है और ईसको कोई काम नहि
यह कैसे पता चले कि देवता आए कि नहि या मन्त्र उसी चक्र का दिया गया है जो खराब है
कौनसा चक्र खराब है
यह एक बड़ी उलझन का विषय है क्योंकि आजकल लोग पैसे के लिए कुछ भी कर जाते हैं
तो परख करना आना चाहिए
अब परख करना कैसे सीखें
आसान है
सहजयोग नाम की संस्था हर शहर में हर सप्ताह कम से कम एक *निषुल्क* कुण्डलिनि जागरण , ध्यान योग का कार्यक्रम चलाती है
किसी भी उम्र का महिला या पुरूष वहा जाकर सीख सकता है
वहा जाईये, सीखिये व परख कीजिए
छठा चक्र जिसे इस्लाम में पुल-सीरत कहा जाता है वह सातवें चक्र में जाकर खुलता है। जब स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं तो साधक को परमानंद की प्राप्ति होती है और जैसा कि पूर्व के अध्यायों में बताया गया है कि परम पिता परमेश्वर का प्रेम उसके अंदर से बहने लगता है। इसका रहस्य केवल (लोगों को और स्वयं को) क्षमा कर देना है। पैगम्बर मोहम्मद ने अपने उदाहरण से क्षमा का सार बताया। उनके इसी क्षमा के गुण के कारण उनके अनुयायियों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होने लगी। वे अपने सभी अनुयायियों को शिक्षा देते थे कि अपने उत्थान के लिये उनको सबको क्षमा करना चाहिये। एक बार पैगम्बर मोहम्मद अल्लाह का संदेश का प्रचार करने के लिये तैफ नाम के गाँव गये जो मक्का के पास एक पहाड़ी स्थान था।
उस गाँव के मुखिया ने उनको झूठा कहते हुये उनका मज़ाक उड़ाया कि अल्लाह को क्या तुम्हारे अलावा कोई और खुदा का बंदा नहीं मिला पैगम्बर बनाने को। पैगम्बर उसकी बात सुन कर उदास हो गये और वे तैफ गाँव को छोड़ कर चले गये। तैफ के लोगों ने उन पर पत्थर बरसाने के लिये छोटे छोटे बच्चों को भेजा जो उन पर बेरहमी से पत्थर बरसाने लगे। उनके शरीर से खून बहने लगा और वे गाँव छोड़ कर चले आये। वे अल्लाह से प्रार्थना करने लगे और रोने लगे। अल्लाह ने जब ये सब देखा तो वे बहुत खफा हुये। देवदूत गैब्रियल और एक अन्य देवदूत के साथ पैगम्बर मोहम्मद को मिलने के लिये आये। वह दूसरा देवदूत पर्वतों तक को जीत सकता था।
तैफ गाँव पर्वतों के बीच बसा हुआ था। देवदूतों ने हज़रत मोहम्मद से पूछा कि अगर आप चाहें तो हम तैफ को पर्वतों के बीच दबाकर चकनाचूर कर दें। उन्होंने उत्तर दिया या मेरे परवरदिगार मैं आपसे इन लोगों की शिकायत करता हूँ। हे दया और करूणा के सागर आप तो गरीबों के और मेरे भी परवरदिगार हो। मैं आपके अलावा और किसके पास जाकर ऐसे लोगों की शिकायत करूँ। अगर आप मुझसे खफा न हों क्योंकि मेरे अंदर वैसी शक्ति ही नहीं है जैसी आपके अंदर है और उन्होंने तैफ के लोगों को क्षमा कर दिया। ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे उनकी क्षमाशीलता के बारे में मालूम होता है।
एक दूसरे उदाहरण के अनुसार जब भी पैगम्बर मोहम्मद एक यहूदी स्त्री के घर के सामने से गुजरा करते थे तो वह उनके ऊपर कूड़ा करकट फेंक देती थी। एक दिन जब वे उसके घर के सामने से गुजर रहे थे लेकिन उस दिन उनके ऊपर उस स्त्री ने कूड़ा नहीं फेंका। वे बड़े हैरान हुये कि क्या बात है? जब उन्होंने इस बारे में पूछताछ शुरू की तो मालूम हुआ कि वह स्त्री तो बीमार है। पैगम्बर तुरंत उस स्त्री को देखने के लिये उसके घर गये। उनको अपने घर पर देख कर उस स्त्री को बहुत शर्मिंदगी का अनुभव हुआ। पैगम्बर मोहम्मद की दयालुता से वह बड़ी प्रभावित हुई। इसके बाद उसने इस्लाम धर्म कुबूल कर लिया।
मुसलमानों द्वारा लड़े गये पहले युद्ध को बदर का युद्ध कहा जाता है क्योंकि इस युद्ध को बदर के कुँओं के पास लड़ा गया था। इस युद्ध में बड़ा संख्या में उन लोगों पर जीत हासिल की गई जो मोहम्मद साहब के विरोध में थे। इस युद्ध में मुसलमान सेना ने अनेकों लोगों को कैद कर लिया। जब उन कैद लोगों के भाग्य का फैसला किया जा रहा था, उस समय अबू बक्र नाम के शख्स ने राय दी कि चूँकि मुसलमानों और मक्का के बाशिंदों की रगों में एक ही खून बह रहा था अतः मुसलमानों को मक्का के लोगों से कुछ रकम हासिल करके उनको छोड़ देना चाहिये। दूसरी ओर ओमर नाम के शख्स ने कहा कि इन कैदियों ने मुसलमानों पर अनेकों ज़ुल्म ढाये हैं और इन्हीं के कारण पैगम्बर मोहम्मद को देश निकाला दे दिया गया था। अतः उसने अपना फैसला सुनाया कि इन कैदियों को बर्बरता से मार डाला जाय।
अबू बक्र और ओमर की राय मानने वालों की संख्या बराबर थी। पैगम्बर साहब ने अबू बक्र का साथ दिया। उन्होंने आदेश दिया कि सभी कैदियों के साथ मानवता का व्यवहार किया जाना चाहिये। उन्होंने उन सभी कैदियों को रिहा कर दिया। उनका आदेश ऐसा होता था कि मुसलमानों ने कैदियों के प्राणों की रक्षा के लिये अपना खाना भी छोड़ दिया और खुद सूखे छुहारे खा कर जीवित रहे।
उनकी रिहाई के बदले में जो रकम रखी गई वह प्रत्येक कैदी की धन संपत्ति अनुसार निश्चित की गई थी। पैगम्बर साहब के चाचा अब्बास को सबसे ज्यादा रकम देनी पड़ी। जबकि कई लोगों को तो बिना कोई रकम लिये हुये ही छोड़ दिया गया। उनको छोड़ने से पहले एक शर्त रखी गई कि जो भी कैदी पढ़ना लिखना जानते हों वे दो अन्य अनपढ़ मुसलमानों को पढ़ना लिखना सिखायेंगे।